Datia By Election Narottam Mishra: मां पीतांबरा की पावन नगरी दतिया में हफ्तों तक चला चुनावी घमासान, एक-दूसरे पर आरोपों का दौर, रोड शो और बैठकों की गहमागहमी अब पूरी तरह शांत हो चुकी है. क्योंकि 30 जुलाई को जनता ने रेफरी बनकर उम्मीदवारों का भविष्य ईवीएम में कैद कर दिया है. अब दतिया उपचुनाव में जीत का ताज किसके सिर सजता है. इसके लिए हमें 3 अगस्त का इंतजार करना होगा. उसी दिन वोटों की गिनती की जाएगी और इसके बाद राजनीतिक सस्पेंस से पर्दा उठ जाएगा. दतिया उपचुनाव में उम्मीदवारों से ज्यादा जो किरदार चर्चा में रहा. वह हैं नरोत्तम मिश्रा. अब चुनाव में जीत चाहें बीजेपी की हो या फिर कांग्रेस की. इसका असर नरोत्तम की राजनीति और उनके भविष्य पर जरूर पड़ेगा.
नरोत्तम मिश्रा दतिया से बीजेपी के टिकट के दावेदारों में शामिल थे और उन्होंने चुनाव ऐलान होने से काफी पहले ही प्रचार करना शुरू कर दिया था. वह जनसभाओं में अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी भी मांगने लगे थे. लेकिन टिकट का नंबर आया, तो उनका हाथ खाली रह गया. वह शादी में उस दूल्हे की तरह गए, जिसकी बारात वापस लौटा दी गई हो. क्योंकि बीजेपी ने दतिया से आशुतोष तिवारी को अपना उम्मीदवार बनाया. वह लंबे समय से संगठन में काम कर रहे थे और दतिया के ही रहने वाले थे.
नरोत्तम का टिकट कटने के बाद हुआ था हुआ बवाल
नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद दतिया में जो बवाल हुआ, तो उसकी चर्चा सिर्फ प्रदेश तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश में हुई. क्योंकि ऐसा बहुत कम हुआ है कि बीजेपी किसी का टिकट काट दे और फिर उसके समर्थक सड़कों पर उतर आएं. नरोत्तम के समर्थकों ने हाईवे को जाम कर दिया और पूरी रात वहीं पर लेटे रहे. इसके बाद नरोत्तम को भोपाल और दिल्ली भी बुलाया, तब उनके तेवर नरम पड़े और उन्होंने आशुतोष तो जिताने की बात कही.
आशुतोष तिवारी के लिए नरोत्तम मिश्रा ने जमकर किया प्रचार
आशुतोष तिवारी के नामांकन फॉर्म भरवाने में भी वह मौजूद रहे और बाइक से घूम-घूमकर पूरे क्षेत्र में वोट भी मांगे. कई बार मंच से वह भावुक होते भी दिखाई दिए. अब दतिया उपचुनाव के रिजल्ट कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक करियर का एक अहम मोड़ बन गए हैं.
अगर भाजपा को करना पड़ा हार का सामना:
*दतिया उपचुनाव में अगर कांग्रेस के उम्मीदवार घनश्याम सिंह जीत जाते हैं, तो पार्टी का एक वर्ग और राजनीतिक विरोधी इस हार का ठीकरा नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के असंतोष पर फोड़ सकते हैं. वहीं उन पर भितरघात के आरोप भी लग सकते हैं. इससे संगठन के भीतर उनकी साख को गहरा धक्का लग सकता है.
*नरोत्तम मिश्रा साल 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार गए थे. कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस तरह की बात सामने आई थी कि दतिया में उनके खिलाफ विरोधी लहर चल रही है. अब अगर 2026 में फिर से बीजेपी को दतिया में हार मिलती है, तो पार्टी नेतृत्व यह मान सकता है कि दतिया में नरोत्तम मिश्रा का जनाधार कमजोर हुआ है. इससे नरोत्तम को आने वाले समय संगठन में किसी पद की जो आस है. उसकी संभावनाएं टल सकती हैं. हार से उन पर मुख्यधारा की राजनीति से दूर होने का खतरा भी मंडरा सकता है.
अगर दतिया उपचुनाव में भाजपा की होती है जीत:
1. अगर दतिया उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार नरोत्तम मिश्रा की जीत होती है, तो इससे यह साबित होगा कि नरोत्तम का दतिया पर दबदबा और कैडर पर नियंत्रण कायम है. वह विधायक न रहते हुए मजबूत और प्रभावी नेता बने रहेंगे.
2. दूसरी तरफ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में उनकी पकड़ मजबूत रहेगी. क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के टॉप लीडर्स की तरफ से यह ही बताया गया है कि यह चुनाव नरोत्तम के नेतृत्व में ही लड़ा जा रहा है. अगर भाजपा जीतती है, तो वह किंग मेकर की भूमिका में बने रहेंगे.
3. अगर भाजपा यह सीट जीतती है, तो इसका सीधा श्रेय नरोत्तम मिश्रा के ‘डैमेज कंट्रोल’ और उनके आक्रामक प्रचार अभियान को जाएगा. समर्थकों की नाराजगी के बावजूद पार्टी के प्रति वफादारी दिखाने का इनाम उन्हें राष्ट्रीय संगठन में या फिर केंद्र में कोई बड़ी रणनीतिक जिम्मेदारी के रूप में मिल सकता है.

